वॉर्श के नेतृत्व में आयोजित हालिया बैठक के बाद बाजार विशेषज्ञों ने संकेत दिया कि उनकी नियुक्ति से पहले निवेशकों के बीच यह धारणा बन रही थी कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) भविष्य में अपेक्षाकृत नरम रुख अपना सकता है। इस उम्मीद के पीछे एक प्रमुख कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वह नाराजगी थी, जो उन्होंने पूर्व फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल के ब्याज दरों में कटौती न करने के फैसलों को लेकर कई बार सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। इसी वजह से कई निवेशक मान रहे थे कि नए नेतृत्व के आने के बाद मौद्रिक नीति में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है।
हालांकि, गोल्डमैन के विश्लेषकों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में फेडरल रिजर्व महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है, तो इसका असर सोने की कीमतों पर भी पड़ सकता है। उनके अनुसार, वर्ष के अंत तक सोने की कीमतों का अनुमान लगभग 500 डॉलर प्रति औंस तक घटकर 4,400 डॉलर प्रति औंस रह सकता है। सामान्यतः जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशकों का रुझान सोने जैसी गैर-ब्याज देने वाली संपत्तियों से हटकर अन्य निवेश विकल्पों की ओर बढ़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप सोने की मांग में कमी आ सकती है और कीमतों पर दबाव बन सकता है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि हाल के वर्षों में कई निवेशकों ने आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और नीतिगत जोखिमों से बचाव के लिए सोने में निवेश को प्राथमिकता दी थी। लेकिन यदि केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रित करने में सफल रहता है और आर्थिक परिस्थितियां अधिक स्थिर दिखाई देती हैं, तो सोने को सुरक्षा कवच के रूप में मिलने वाला अतिरिक्त समर्थन कमजोर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में निवेशकों की रणनीति बदल सकती है और वे अपने निवेश को अन्य परिसंपत्तियों में स्थानांतरित कर सकते हैं।
गोल्डमैन सैक्स के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी हाल के दिनों में ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना पर चर्चा की है। गोल्डमैन सैक्स के उपाध्यक्ष और डलास फेड के पूर्व अध्यक्ष रॉब कैपलन ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो फेडरल रिजर्व को सितंबर से ही ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार करना पड़ सकता है। उनका मानना है कि मूल्य स्थिरता बनाए रखना फेड की प्राथमिक जिम्मेदारी है, और यदि महंगाई पर नियंत्रण नहीं पाया जाता, तो केंद्रीय बैंक को सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसलिए आने वाले महीनों में महंगाई के आंकड़े, रोजगार बाजार की स्थिति और आर्थिक विकास दर जैसे संकेतक निवेशकों तथा नीति-निर्माताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे।
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